Monday, November 12, 2018

वो सैन्य अभ्यास जो दुनिया ख़त्म कर सकता था

ये बात 7 नवंबर 1983 की है. 100 के क़रीबी सीनियर सैन्य अधिकारी नेटो के ब्रसेल्स स्थित मुख्यालय में जुटे. उनका मक़सद था तीसरा विश्व युद्ध 'लड़ना'.

ये 'लड़ाई' वो हर साल करते थे. इसका नाम था 'एबल आर्चर'. ये एक युद्धाभ्यास था, जो नेटो देशों की सेनाएं करती थीं, ताकि वक़्त आने पर सोवियत संघ की सेना का मुक़ाबला कर सकें. और एबल आर्चर युद्धाभ्यास, परंपरागत युद्ध की वर्जिश 'ऑटम फोर्ज' के आख़िर में होता था.

इसमें नेटो देशों की हज़ारों सैन्य टुकड़ियां पश्चिमी यूरोप में होने वाले युद्धाभ्यास में हिस्सा लेती थीं.

जिस वक़्त 'एबल आर्चर 83' युद्धाभ्यास हो रहा था, तब शीत युद्ध चरम पर था.

नेटो देशों के संबंध वारसॉ पैक्ट के देशों यानी सोवियत संघ के समर्थक देशों से बहुत ख़राब हो गए थे. उसी साल की शुरुआत में अमरीकी राष्ट्रपति रोनाल्ड रीगन ने सोवियत संघ को 'शैतान का साम्राज्य' कहा था.

1983 के सितंबर महीने में ही सोवियत संघ के पायलटों ने अपनी सीमा में घुस आए कोरियन एयरलाइंस के एक नागरिक विमान को मार गिराया था. इसमें विमान में सवार सभी 269 लोग मारे गए थे.

लोहे की दीवार के दोनों तरफ़ मध्यम दूरी तक मार करने वाले एटमी हथियार तैनात किए जा रहे थे.

ब्रिटेन में इसी दौर में ग्रीनहैम कॉमन इलाक़े में एटमी मिसाइलें तैनात की गई थीं. ये मिसाइलें और एटमी हथियार, लॉन्च होने के पांच मिनट के अंदर अपने निशाने को तबाह कर सकती थीं.

कुल मिलाकर दुनिया विनाश लाने वाले एटमी जंग की कगार पर खड़ी थी.

क्या हुआ था काल्पनिक सैन्य अभ्यास में?

'एबल आर्चर 83' युद्धाभ्यास में जिस जंग की कल्पना की गई थी, उसकी शुरुआत अरब देशों में उठा-पटक से होनी थी.

इसकी वजह से सोवियत संघ को तेल की सप्लाई में बाधा आई थी. वहीं, युगोस्लाविया, जो गुटनिरपेक्ष देश था, वो पश्चिमी देशों के खेमे में चला जाता है.

इस वॉरगेम में सोवियत संघ के नेताओं को इस डर का शिकार होते दिखाया गया था कि युगोस्लाविया के पश्चिमी खेमे में जाने से दूसरे देश भी सोवियत संघ का साथ छोड़कर जा सकते हैं.

वो वार्सा पैक्ट छोड़कर नेटो में शामिल हो सकते हैं. इससे कम्युनिस्ट देशों की पूरी व्यवस्था चरमराकर तबाह होने का डर सोवियत नेताओं को दिख रहा था.

कल्पना का युद्ध
कल्पना का ये युद्ध उस वक़्त शुरू हुआ, जब सोवियत संघ के टैंक युगोस्लाविया में घुस आए.

इसके बाद स्कैंडिनेवियाई देशों यानी डेनमार्क, नॉर्वे और स्वीडन पर सोवियत सेनाओं ने हमला बोला. जल्द ही सोवियत सेनाएं पश्चिमी यूरोपीय देशों में दाखिल होने लगी थीं. दबाव में नेटो देशों की सेनाओं को पीछे हटना पड़ा.

कुछ महीने बाद ये काल्पनिक जंग फिर से शुरू हो गई. पश्चिमी देशों के नेताओं ने सोवियत संघ के ख़िलाफ़ एटमी हथियारों के इस्तेमाल की इजाज़त दे दी.

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